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महर्षि संतसेवी परमहंस जी महाराज

महर्षि संतसेवी परमहंस जी महाराज

भारतवर्ष में आदिकाल से संत-महात्माओं की अपनी विशिष्ट परम्परा रही है। प्रत्येक कालखण्ड में इस प्रकार की दिव्य आत्माओं ने जन सामान्य का मार्ग-दर्शन कर समाज में आई कुरीतियों को दूर करने में अपना योगदान किया है। दैहिक, दैविक एवं भौतिक तापों से परित्रण हेतु लोगों को धार्मिक जीवन व्यतीत करने का उपदेश दिया है। उन्हीं संतों की परम्परा में पूज्यपाद महर्षि संतसेवी परमहंसजी महाराज भी हुए हैं।

पूज्यपाद महर्षि संतसेवी परमहंसजी महाराज का आविर्भाव बिहार राज्यान्तर्गत मधेपुरा जिले (पूर्व सहरसा) के गमहरिया गाँव में सन् 1920 ई0 के 20 दिसम्बर को हुआ। माता-पिता ने इनका नाम महावीर रखा। बचपन में ये महावीर बजरंगवली के अनन्य उपासक भी थे। हनुमान चालीसा इन्हें कंठस्थ था और ये नित्य उसका पाठ किया करते थे।

महर्षि संतसेवी परमहंसजी महाराज की शिक्षा मिड्ल तक ही हो पाई। ये आगे नहीं पढ़ सके। घरेलू खर्च के लिए इन्होंने छात्रें को ट्यूशन पढ़ाना आरम्भ किया।

एक समय की बात है। ये अररिया जिला (पूर्व पूर्णियाँ) के सैदाबाद ग्राम में अध्यापन कार्य करते थे। यहाँ से कुछ दूरी पर कनखुदिया गाँव में मार्च, 1939 ई0 में बाबा लच्छन दासजी ने सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज की स्वीकृति पाकर मास-ध्यानाभ्यास का आयोजन किया था। महर्षिजी वहाँ मास भर ठहरे थे। यह शुभ अवसर जान इनके अंदर पड़ा भक्ति-बीज प्रस्फुटित हो चला। भक्ति की ज्वाला तेज हो गई। ये उनके दर्शनार्थ चल पड़े। वहाँ सद्गुरु महर्षि मेँहीँ के शरणागत हो, इन्होंने भजन-भेद लेने की इच्छा व्यक्त की। गुरु ने शिष्य की पात्रता को पहचाना। आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर होने की उत्सुकता देखकर महर्षि मेँहीँ ने इन्हें 29 मार्च, 1939 ई0 में मानस जप, मानस ध्यान और दृष्टियोग की दीक्षा दी। इन्होेंने पुनः इच्छा व्यक्त की कि गुरुदेव इस तुच्छ सेवक को अपने चरणों में रख लेने की कृपा करें। गुरुदेव का उत्तर था-‘आप जो कर रहे हैं, करें। समय पर बुलाऊँगा।’ अनुमति प्राप्त कर आप सैदाबाद चले आए, जहाँ अध्यापन-कार्य करते थे।

महर्षि मेँहीँ चरित में वर्णन आया है-1940 ई0 में बभनगामा (भागलपुर) के एक सत्संग में वहाँ के श्रीकालीचरणजी सत्संगी ने महर्षिजी से निवेदन किया-‘सरकार! इनको साथ में रख लिया जाता, तो अच्छा होता। इनके स्वर में बड़ी मिठास है, संतवाणियों का पाठ बहुत अच्छा करते हैं।’ महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज ने उत्तर दिया-‘मन तो मेरा भी करता है; लेकिन अभी इनकी माँ को क्यों रुलावें।’ (महर्षि मेँहीँ के दिनचर्या उपदेश, पृष्ठ 149)

ये गुरु-प्रदत्त साधना को एकनिष्ठ होकर तत्परता से विधिवत् करते रहे। सन् 1940 ई0 से 1945 ई0 तक ये महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज के आज्ञानुसार उनके पास आया-जाया करते तथा भ्रमण-कार्य में सम्मिलित होकर ध्यानाभ्यास करते हुए विविध प्रकार की सेवाएँ भी कर लिया करते। (महर्षि मेँहीँ के दिनचर्या उपदेश, पृष्ठ 119)

सन् 1946 ई0 में इनकी माताजी परलोक सिधार गईं, तब गुरुदेव ने इन्हें अपने पास बुला लिया। सत्संग के प्रचार में वे कहीं जाते, तो इन्हें साथ ले लेते। गुरुदेव इनसे ग्रंथ-पाठ कराते और भजन गवाते। इनकी वाणी में मधुरता थी और आवाज सुरीली थी।

सद्गुरु महर्षि मेँहीँ इन्हें पुत्रवत् स्नेह देते थे। उन्होंने कुछ वर्षों तक धरहरा आश्रम में रखकर इन्हें मनिहारी आश्रम भेज दिया। मनिहारी आश्रम में गुरुदेव ने इन्हें गुरुमुखी लिपि सिखायी।

आपकी इच्छा-पूर्ति करने के लिए महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज ने आपको दस वर्षों तक अपनी कसौटी पर कसकर सन् 1949 ई0 में सदा के लिए आपको अपने सेवार्थ रख लिया। तब से 8 जून, 1986 ई0 तक (जब महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज ने अपना पार्थिव शरीर छोड़ा) आपने गुरु-सेवा में अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। लगातार 37 वर्षों तक संत सद्गुरु महर्षि मेँहीँ के श्रीचरणों में रहकर जो सेवा-कार्य सम्पादित किया, वह गुरु-शिष्य परम्परा के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है।

2 जून, सन् 1952 ई0 को सिकलीगढ़ धरहरा में प्रसन्न होकर गुरुदेव ने आपको नादानु- संधान की क्रिया बता दी और दिनांक 27 अक्टूबर, 1957 ई0 को संन्यास प्रदान किया।

गुरु और शिष्य का संबंध एक जन्म का नहीं, कई जन्मों का होता है। आपकी अटूट सेवा-भक्ति से प्रसन्न होकर आपके गुरु महाराज ने आपको ‘संतसेवी’ का पद प्रदान किया था। तब से आप ‘संतसेवी’ नाम से जगत् में प्रसिद्ध हुए हैं। आप छाया की भाँति अपने गुरु महाराज की सेवा में सतत संलग्न रहे। कभी आप अपने गुरु महाराज को अकेले नहीं छोड़ते थे। यह है आपकी गुरु-सेवा, गुरु-भक्ति। इसीलिए तो आपके गुरु महाराज कहते थे कि ‘मुुझमें और संतसेवीजी में कोई फर्क नहीं है। जो मैं हूँ, सो संतसेवीजी हैं।’

आपने अपने श्रीसद्गुरु महाराज की छत्रच्छाया में लगभग अर्द्ध शताब्दी तक रहकर उनकी ऐसी सेवा और साधना की कि गुरु-कृपा से आदिनाम का साक्षात्कार कर आप परमहंस हो गए। कबीर साहब ऐसे संतों के बारे में कहते हैं-

आदिनाम निज सार है, बुझि लेहु सो हंस ।

जिन जान्यो निज नाम को, अमर भयो सो वंस ।।

3 मई, 1997 ई0 में अखिल भारतीय संतमत-सत्संग के 86वें वार्षिक महाधिवेशन में देश-विदेश के धर्माचायोर्ं, महामण्डलेश्वरों एवं विद्वानों ने एक स्वर से आपको ‘महर्षि परमहंस’ की उपाधि से विभूषित कर अध्यात्म-जगत् को गौरव प्रदान किया। तब से आप &l

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