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संत तुलसी साहब

संतों के विषय में सही और पूरी जानकारी कम ही प्राप्त होती है । तुलसी साहब के जीवन का वृत्तान्त तो और भी दुर्लभ है । उनके प्रारम्भिक जीवन का विवरण अस्पष्ट और धुंधला है । यद्यपि वे उन्नीसवीं सदी के मध्य तक रहे, फिर भी उनके मूल नाम, उनके पिता और परिवार के बारे में इतिहास मौन है ।

तुलसी साहब के प्रारम्भिक जीवन के विषय में जो विभिन्न विवरण मिलते हैं, वे संक्षेप में यहाँ दिये जाते हैं ।

बेल्वेडियर प्रेस द्वारा प्रकाशित तुलसी साहब के ‘रत्न सागर’ (प्रथम प्रकाशन ûùúù ईú) में दिये गये जीवन-चरित्र के अनुसार तुलसी साहब का जन्म एक उच्च ब्राह्मण परिवार में हुआ था । किशोर अवस्था से ही आपको संसार के प्रति अरुचि थी । छोटी उम्र में ही सब कुछ त्याग दिया और अन्त में जिला अलीगढ़ के हाथरस शहर में आकर रहने लगे । इस वृत्तान्त में तुलसी साहब के असली नाम, उनके माता-पिता के नाम तथा उनके जन्मस्थान के विषय में कोई उल्लेख नहीं है ।

इसी प्रेस ने सन् ûùûû में तुलसी साहब का प्रसिद्ध ग्रंथ ‘घट रामायण’ प्रकाशित किया । इसके प्रारम्भ में तुलसी साहब के जीवन चरित्र के विषय में और प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है । इसके अनुसार तुलसी साहब का जन्म सन् ûझ्öý में हुआ और ûøþý में øú वर्ष की आयु में आपने शरीर छोड़ा । वे पुना के राजा û के सबसे बड़े पुत्र थे । वे जाति के ब्राह्मण थे तथा उनका नाम श्यामराव था । उनकी इच्छा के विरुद्ध छोटी उम्र में ही उनके पिता ने उनका विवाह कर दिया । उनकी पत्नी का नाम लक्ष्मीबाई था और इस विवाह से उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुई । उनके पिता की रुचि अध्यात्म और प्रभु-भक्ति की ओर थी । वे अपनी गद्दी त्यागकर श्यामराव को राज्य देना चाहते थे ताकि बाकी जीवन भक्ति में बितायें । परन्तु श्यामराम खुद भी संसार की ओर से उदासीन थे और राज्य-वैभव की जिन्दगी के प्रति उनमें कोई झुकाव न था । अपने राज्याभिषेक के एक दिन पहले ही वे अपने महल से भाग निकले । काफी तलाश के बाद भी जब श्यामराव का पता न चला तो उनके छोटे भाई को राजा बनाया गया ।

श्यामराव कई वर्षों तक जंगलों, पहाड़ों, गाँवों और शहरों में घूमते रहने के बाद हाथरस में आये । हाथरस को आपने अपना स्थायी निवास बनाया और अपना बाकी जीवन यहीं बिताया । यहीं आप तुलसी साहब के नाम से प्रसिद्ध हुए ।

आचार्य क्षितिजमोहन सेन, डॉú राजकुमार वर्मा, डॉú पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल, आचार्य परशुराम चतुर्वेदी तथा अन्य आधुनिक विद्वानों ने ऊपर दिये दो वृत्तान्तों में से एक को अपनाया है । ü

महाराष्ट्र के एक प्रमुख इतिहासवेत्ता श्रीविट्ठल राú ठकार ने हाल ही में पेशवा-वंश के दस्तावेजों का अध्ययन करके तुलसी साहब के विषय में कुछ खोज की है, जो इस बात की पुष्टि करती है कि तुलसी साहब पेशवा परिवार से संबंधित थे । यद्यपि श्रीठकार की खोज अभी पूरी नहीं हुई है, फिर भी उनका कथन है कि इस बात के पक्ष में समुचित आधार हैं कि तुलसी साहब वास्तव में पेशवा बाजीराव के प्रथम दौहित्र (बाजीराव प्रथम की कन्या के पुत्र) अमृत राव थे । उनका जन्म ûझ्öý-öþ में हुआ था और जब वे तीन-चार वर्ष के थे, तब रघुनाथ राव ने उन्हें गोद ले लिया था । इस प्रकार अमृतराव बाजीराव द्वितीय के बड़े भाई थे । शुरू से ही अमृतराव स्वभाव से गम्भीर, विवेकशील और निष्कपट थे । राजनैतिक षड्यंत्रें से उन्हें घृणा थी । पेशवा दरबार के राजनैतिक दाव-पेंचों से ऊबकर वे सन् ûøúþ में पूना छोड़कर बनारस आ गये और अपना जीवन मालिक की भजन-बंदगी में लगा दिया । ûøúø-ù में आप हाथरस आये और यहाँ अपने अंतिम समय ûøþý तक रहे । परन्तु यह स्पष्ट पता नहीं लगता कि अमृतराव कब और कैसे तुलसी साहब के नाम से पुकारे जाने लगे ।

ऊपर दिये वृत्तान्तों पर गौर करने से यह पता चलता है कि इन सभी में कुछ ऐसी बातें हैं जिन्हें काफी हद तक सही माना जा सकता है । संक्षेप में ये इस प्रकार है:

तुलसी साहब ने उच्च तथा कुलीन परिवार में जन्म लिया था और वे पेशवा के राजवंश में से थे ।

उनका जन्म अट्ठारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध में हुआ था । आध्यात्मिक ध्येय की प्राप्ति के लिए सांसारिक ऐश्वर्यों को त्यागने की ओर शुरू से उनका झुकाव था ।

वे अपने जन्म-स्थान से भागे और कोई पहचान न ले, इसलिए अपने को छिपाये रखा । हो सकता है कि अपने को अज्ञात रखने के लिए ही उन्होंने अपना नाम श्यामराव रख लिया हो ।

उन्होंने बहुत भ्रमण और अनेक यात्रएँ कीं और अन्त में जिला अलीगढ़ के हाथरस शहर को अपना स्थायी निवास-स्थान बनाया ।

यह भी निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि तुलसी साहब दक्षिण भारत से आये थे; क्योंकि लोग उन्हें ‘दक्खिनी बाबा’ के नाम से पुकारते थे ।

इस बात का कोई पता नहीं लगता कि तुलसी साहब को कब सतगुरु मिले और न यह ही पता लगता है कि सुरत-शब्दयोग के मार्ग में वे कब दीक्षित हुए । जब वे पूना में राजकुमार थे, उस समय या बाद में जबकि सब कुछ त्यागकर उन्होंने एक भ्रमणशील जीवन अपनाया ।

तुलसी साहब ने अपनी रचनाओं में सतगुरु के प्रति अपनी श्रद्धा तो प्रकट की है, पर उनके नाम का उल्लेख नहीं किया है । एक मराठीभाषी विद्वान् ने एक पत्रिका में लिखा है, श्श् तुलसी साहब को उनके गुरु ने हाथरस शहर में दीक्षा दी और अपने गुरु के आदेश के अनुसार उन्होंने बहुत अभ्यास किया है ।य् û

सभी युगों में, सब सन्तों ने परमात्मा की प्राप्ति के लिए वक्त के सतगुरु की आवश्यकता पर जोर दिया है । सन्तमत में सतगुरु की बहुत जरूरत है । सतगुरु के 

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